1 फ़रवरी 2020 - 16:31
इस्लामी क्रांति की सफलता की वर्षगांठ के अवसर पर विशेष कार्यक्रम

12 बहमन वर्ष 1357 हिजरी शमसी बराबर पहली फ़रवरी वर्ष 1979 की सुबह ईरान की जनता भय व आशा से भरे हुए क्षण बिता रही थी।

उसके प्रिय नेता इमाम ख़ुमैनी पेरिस से तेहरान वापस आने वाले थे हालांकि पिट्ठू पहलवी शासन ने उनकी वापसी के बारे में तरह तरह की धमकियां दे रखी थीं। इमाम ख़ुमैनी, जो एक धर्मगुरु और जनाधारित नेता थे और जिन्हें तानाशाही शासन ने 14 बरसों से ईरानी राष्ट्र से दूर कर रखा था, गहरी चिंताओं के बीच जनता के बीच लौट रहे थे। 16 जनवरी सन 1979 को ईरान के पिट्ठू शासक मुहम्मद रज़ा पहलवी के ईरान से फ़रार हो जाने के बाद इमाम ख़ुमैनी ने स्वदेश वापसी के अपने फ़ैसले की घोषणा कर दी थी।

इमाम ख़ुमैनी के इस साहसिक लेकिन साथ ही ख़तरनाक फ़ैसले ने इस्लामी क्रांति के समर्थक और विरोधी दोनों चिंतित हो गए थे। एक ओर ईरान की जनता यद्यपि बड़ी बेसब्री से अपने नेता से मिलने की प्रतीक्षा कर रही थी लेकिन इसी के साथ उस इस बात का भी भय था कि कहीं शाह के एजेंट इस यात्रा में उन्हें कोई क्षति न पहुंचा दें। दूसरी ओर पहलवी शासन और उसके अमरीकी समर्थक जानते थे कि ईरान में इमाम ख़ुमैनी की उपस्थिति जनता में क्रांति की ज्वाला और भड़का देगी और क्रांति की सफलता की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाएगी। यही कारण था कि जब इमाम ख़ुमैनी ने स्वदेश वापसी का अटल फ़ैसला कर लिया तो उन लोगों ने उन्हें रोकने और उनकी ऐतिहासिक यात्रा में रुकावट डालने के लिए कोशिशें शुरू कर दीं। इसके मुक़ाबले में क्रांतिकारी बलों ने भी इन कार्यवाहियों को विफल बनाने और इमाम ख़ुमैनी की स्वदेश यात्रा का मार्ग प्रशस्त करने के लिए अपनी हर संभव कोशिश की।

शाह के ईरान से भागने के तीन दिन बाद ईरान की क्रांतिकारी जनता ने अपने पहले क़दम के रूप में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के चेहलुम या चालीसवें के दिन एक बड़ा जुलूस निकाला। इस दिन दसियों लाख लोगों ने ईरान के विभिन्न शहरों में जुलूस निकाले और अपने प्रिय नेता की स्वदेश वापसी की मांग की। चेहलुम के दिन इस अहम घटना ने दर्शा दिया कि ईरानी जनता अब भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महान आंदोलन को इस्लामी क्रांति की सफलता के लिए अपना आदर्श समझती है। इस बीच ईरान के लिए अमरीका के विशेष सैन्य प्रतिनिधि राबर्ट हायज़र की कमान में पहलवी शासन के सैन्य अधिकारियों ने इमाम ख़ुमैनी की स्वदेश वापसी को रोकने के लिए कई योजनाएं तैयार कीं जिनमें उनके विमान का रास्ता बदलने और उसे किसी अन्य हवाई अड्डे पर उतारने पर सबसे अधिक ध्यान केंद्रित किया जाता है।

इमाम ख़ुमैनी ने घोषणा की कि वे 26 जनवरी को स्वदेश वापस लौटेंगे लेकिन शापूर बख़्तियार के नेतृत्व में पहलवी शासन की अंतिम सरकार ने घोषणा कर दी कि देश के सभी हवाई अड्डे बंद हैं और कोई भी हवाई जहाज़ ईरान में नहीं उतर सकता। सरकार की इस घोषणा से लोगों में आक्रोश भड़क उठता है और प्रदर्शनों, हड़तालों और झड़पों में वृद्धि हो जाती है। इसी के साथ बैरिकें छोड़ कर जनता के साथ सैनिकों के जुड़ने के क्रम में भी तेज़ी आ जाती है और वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी जनता के साथ आ मिलते हैं। इमाम ख़ुमैनी एक संदेश में ईरानी जनता से कहते हैं कि वे कुछ ही दिन बाद ईरान लौटेंगे और एक सिपाही की तरह उनके साथ मिल कर साम्राज्य और तानाशाही के ख़ात्मे तक संघर्ष जारी रखेंगे। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की बरसी के अवसर पर ईरान के विभिन्न शहरों में जनता के व्यापक प्रदर्शन आयोजित होते हैं जिनमें लोग क्रांति की राह जारी रखने और अपने नेता को स्वदेश वापस लाने पर बल देते हैं। शाह के पिट्ठू सैनिक पूरी ताक़त से जनता को कुचलने की कोशिश करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप बड़ी संख्या में क्रांतिकारी महिलाएं और पुरुष शहीद हो जाते हैं।

ईरान के कुछ अहम व प्रमुख धर्मगुरू, देश के हवाई अड्डे बंद किए जाने के विरोध में तेहरान विश्वविद्यालय की मस्जिद में धरने पर बैठ जाते हैं। क्रांतिकारी बल इस धरने का व्यापक रूप से स्वागत करते हैं और अन्य शहरों में भी धर्मगुरुओं के धरने शुरू हो जाते हैं। ये सारे दबाव, सरकार को पीछे हटने पर मजबूर कर देते हैं और वह घोषणा करती है कि इस्लामी क्रांति के नेता इमाम ख़ुमैनी स्वदेश लौट सकते हैं। इसके तुरंत बाद इमाम ख़ुमैनी के स्वागत की समिति, जो पहले ही गठित हो चुकी थी, घोषणा करती है कि इस्लामी क्रांति के नेता 12 बहमन अर्थात पहली फ़रवरी को स्वदेश लौटेंगे। इस तारीख़ से एक दिन पहले ईरान के विभिन्न स्थानों से लोग राजधानी तेहरान पहुंच जाते हैं और अपने प्रिय नेता के स्वागत की तैयारियों में जुट जाते हैं।

तेहरान के मेहराबाद हवाई अड्डे से लेकर इस्लामी क्रांति के हज़ारों शहीदों के क़ब्रिस्तान, बहिश्ते ज़हरा तक का पूरा रास्ता फूलों से सजा दिया जाता है। कार्यक्रम के अनुसार इमाम ख़ुमैनी, हवाई अड्डे से सीधे बहिश्ते ज़हरा जाएंगे और शहीदों को श्रद्धांजली अर्पित करेंगे। वे पेरिस में फ़्रान्स के लोगों का आभार प्रकट करते हैं कि उन्होंने उनका आतिथ्य सत्कार किया और इसके बाद अपने कुछ साथियों के साथ हवाई जहाज़ से ईरान के लिए रवाना हो जाते हैं। सभी के दिलों में घबराहट है और एकमात्र व्यक्ति जो पूरी तरह संतुष्ट, शांति व निश्चिंत है, वही है जिसकी जान पर ख़तरे की वजह से सब घबराए हुए थे। इमाम ख़ुमैनी ने ईश्वर पर ईमान व भरोसे के कारण प्राप्त होने वाले संतोष व शांति के साथ स्वदेश की यात्रा शुरू की। उन्होंने हवाई जहाज़ में भी भोर और सुबह की नमाज़ उतनी की निष्ठा के साथ पढ़ी, जैसी वे हमेशा पढ़ता करते थे।

इधर तेहरान के मेहराबाद हवाई अड्डे पर हंगामा था। क्रांति के अहम नेताओं, हस्तियों व आम लोगों की भीड़ भय व आशा की स्थिति में क्रांति के नेता की प्रतीक्षा कर रही थी और उनके स्वागत के लिए एक भव्य जनाधारित कार्यक्रम तैयार किया गया था। अंततः ईरान के इतिहास के महानायक को लेकर आने वाला हवाई जहाज़ पहली फ़रवरी को सुबह साढ़े नौ बजे बिना किसी समस्या के ज़मीन पर उतर गया और उत्सुक लोगों की बाढ़ सी आ गई। मानो ईरानी राष्ट्र के शरीर में एक नई आत्मा पड़ गई। हवाई अड्डे से लेकर बहिश्ते ज़हरा तक का लम्बा रास्ता, अपने प्रिय नेता की एक झलक देखने की लालसा लिए लोगों से भरा हुआ था।

इमाम ख़ुमैनी ने हवाई अड्डे पर एक संक्षिप्त भाषण दिया और सभी का आभार प्रकट करते हुए एकता के लिए उनका आह्वान किया। उन्होंने बल देकर कहा कि शाह को देश से निकालना, विजय का पहला चरण है और अगला चरण विदेशी साम्राज्यवादियों को बाहर निकालना और पहलवी शासन की सभी जड़ों को काट देना है। इसके बाद वे हवाई अड्डे से बाहर निकल कर लोगों के बीच पहुंचे जो घंटों से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। हवाई अड्डे से बहिश्ते ज़हरा का रास्ता कई घंटों में तै हुआ जबकि किसी सैन्य हेलीकाप्टर या विमान से उनकी गाड़ी पर हमले का ख़तरा अब भी मौजूद था।

बहिश्ते ज़हरा में क्रांति के लिए अपने प्राणों की आहूति देने वालों की क़ब्रों के पास और लाखों लोगों के समक्ष इमाम ख़ुमैनी के ऐतिहासिक भाषण की बात ही कुछ और थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में पिट्ठू पहलवी शासन और उसके द्वारा नियुक्त की गई सरकार को ग़ैर क़ानूनी बताया और कहा कि वे जनता के समर्थन से नई सरकार नियुक्त करेंगे। इस्लामी क्रांति के नेता ने विदेशियों विशेष कर अमरीका द्वारा ईरान के स्रोतों की लूट-मार की निंदा की और वादा किया कि ईरान में उनके हस्तक्षेप को समाप्त कर दिया जाएगा। ईरानी जनता की ओर से अपने नेता के वैभवशाली, अभूतपूर्व व भुलाए न जाने वाले स्वागत को पूरी दुनिया में व्यापक कवरेज मिली और अनेक पश्चिमी संचार माध्यमों ने उसे अभूतपूर्व बताया और स्वागत करने वालों की संख्या का अनुमान साठ लाख तक लगाया।

यद्यपि पहली फ़रवरी का कार्यक्रम इमाम ख़ुमैनी के भाषण के साथ ख़त्म हो गया लेकिन ईरान और क्रांतिकारी जनता के बीच उनकी उपस्थिति के परिणाम आश्चर्यजनक थे। सेना में शाह के वफ़ादार थोड़े बहुत लोग अब भी अपनी शक्ति और अमरीका की मदद की ओर से आशावान थे लेकिन जनता बल्कि क्रांति के नेताओं ने भी कल्पना नहीं की थी कि इमाम ख़ुमैनी की स्वदेश वापसी के केवल दस दिन बाद ही यह महान जनांदोलन सफल हो जाएगा। इमाम ख़ुमैनी ने स्वदेश वापसी के तीन दिन बाद, पुराने संघर्षकर्ता महदी बाज़रगान को इस्लामी क्रांति की अस्थायी सरकार का प्रधानमंत्री नियुक्त किया और उक्त सरकार को यह ज़िम्मेदारी सौंपी कि वह देश के संचालन के साथ ही पहलवी शासन के पतन के बाद ईरान में शासन व्यवस्था के निर्धारण के लिए जनमत संग्रह और संविधान का संकलन करने वाली परिषद का चुनाव आयोजित कराए। उसी दिन जनरल हायज़र, जो पहलवी शासन को बचाने और विद्रोह कराने की ओर से निराश हो चुका था, अपने देश लौट गया। उसने अपनी किताब में इस्लामी क्रांति की तेज़ रफ़्तार प्रगति पर अपना आश्चर्य इस प्रकार प्रकट किया है। “आयतुल्लाह ख़ुमैनी के धड़े के क़दम और कार्यवाहियां इतने सटीक ढंग से आगे बढ़ रही थीं कि मैं हतप्रभ था कि कौन इतने सही कार्यक्रम तैयार कर रहा है और मुझे अब तक अपने सवाल का जवाब नहीं मिला है।

इमाम ख़ुमैनी की स्वदेश वापसी और ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद इस देश में इतनी तेज़ी से परिवर्तन आए जिसकी कल्पना उस समय किसी ने भी नहीं की थी। सीआईए के तत्कालीन प्रमुख स्टेन्सफ़ील्ड टर्नर ने शाह के विरोधियों की ताक़त से अमरीका की अनभिज्ञता को स्वीकार करते हुए लिखा है कि हमने यह कभी सोचा ही नहीं था कि चौदह साल के निर्वासन के बाद एक 78 वर्षीय व्यक्ति की वापसी, एक पूरी व्यवस्था को स्थापित कर सकती है और देश के विभिन्न बलों को एकत्रित कर सकती है। उन्होंने एक ज्वालामुखी की तरह एक राष्ट्रीय क्रांति का लावा बिखेर दिया है।

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता एक सरकार को परिवर्तित करने और उसके स्थान पर एक नई एवं प्रजातांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने हेतु केवल एक आंतरिक घटना नहीं थी बल्कि अमरीका, यूरोप तथा ज़ायोनी शासन के बहुत से अधिकारियों ने अपने बयानों तथा लेखों में इस्लामी क्रांति की सफलता को पश्चिम के लिए एक विध्वंसक भूकंप बताया था। पहलवी शासन काल में ईरान पर व्यापक वर्चस्व के चलते, मध्यपूर्व में अमरीका की अत्यंत सुदृढ़ राजनैतिक, आर्थिक एवं सामरिक स्थिति थी। इस्लामी क्रांति की सफलता ने ईरान से अमरीका के वर्चस्व को समाप्त कर दिया और इस देश में मौजूद अमरीका के राजनैतिक व सैनिक बलों को बाहर निकलने पर विवश कर दिया। इस प्रकार इस्लामी क्रांति ने मध्यपूर्व में शक्ति के संतुलन का आधार ही बदल दिया और अमरीका को इस क्षेत्र में उसकी नीतियों के एक सबसे महत्वपूर्ण आधार से वंचित कर दिया।